Thursday, September 18, 2008

Bachpan

बचपन में कहानियां सुनते थे,राजा-रानी के किस्से, परियों के कहानी, अलादीन की जादुई दुनिया, सिंदबाद का जहाज, अली बाबा और चालीस चोर.......और संसार उन्ही कहानियो में सिमट जाता था!खेलते हुए कभी अलादीन के चिराग को तो कभी राजा-रानी की पोशाकों को खोजते थे........आँखे कभी न पूरा होने वाले ख्वाब बुन लिया करती थी!आज आँखों पर "चश्मा" चढ़ गया है, हर ख्वाब को आने से पहले "इजाज़त" लेनी पड़ती है.....जो ख्वाब हकीकत के दायेरे से बड़ा होता है...वो धुंधला नज़र आता हैअब कहानियो के आवश्यकता नहीं है........हर इन्सान दोहरी ज़िन्दगी जी रहा है!एक कहानी तो दूसरा "जीवन सत्य"एक का जीवन दुसरे के इलिए कहानी है,कल और आज में फर्क सिर्फ इतना है......कल एक ही कहानी को बार बार दोहराया जाता था........आज हर "कहानी" में नयापन है, ....... "हकीकत का"

1 comment:

रश्मि प्रभा said...

आज भी पलकें मूंद लो,बचपन की गलियों में दौड़ जाओ
तब जानोगे इन कहानियो से ही बचपन मासूम होता है
नानी,दादी की कहानियो में,माँ की लोरी में
जीवन का सरल उद्देश्य होता है
हकीकत की ज़मीन भी कहानियो के आधार पर ही मिलती है
बचपन को हर रात पलकों में मूंद कर सोवो..........
औए इतने ही खुबसूरत एहसास लिखो.